बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

बातें किताबें मुलाकातें भाग ४

हम अब सोनीपत से उपन्यासों की ताजातरीन गर्मागर्म प्रतियाँ लेकर घर पहुँच चुके थे। वहा पहुँचते ही दुबारा अभीराज को आवाज दी। आखिर सामान भी तो उठवाना था ना। अभिराज और आदित्य भाई के होनहार बेटे सिद्धार्थ किताबो के बक्से उठाये। जी मैंने भी उठाये और अपनी साइज के अनुपात में दुगुना वजन ही उठाया, न भाई बेईमानी वाला काम नहीं।
अब सब पैकेट्स घर पर पहुँच चुके थे। सुबह दिल्ली पहुँचने के बाद से काफी भागदौड़ हो चुकी थी। घर आते आते साढ़े आठ बज गए। अब सभी हाथ मुंह धोकर फ्रेश हो चुके थे। भूख तगड़ी लगी थी। फिर ध्यान आया के यार मै और शुभानन्द जी तो कल से नहाए ही नहीं है। मिथिलेश को कहा तो उसने कह दिया कल सुबह नहा लेना मै भी पहले दिन नही नहाया था,ठंड ही इतनी थी। चूँकि ठंड में हम हाइवे का लंबा सफर करके आये हुए थे इसलिए ठंड के मारे मेरी दुबारा हिमत न हुई के शुभानन्द जी को कहू नहाने के लिए। अब हम सभी एक साथ बैठे हुए थे। भाभी जी लजीज व्यंजन बनाये थे जो इतना स्वादिष्ट था के हमने गले तक ठूंस लिया। फिर आदित्य जी का शुभानन्द जी के प्रति प्यार उमड़ा और उन्होंने अपने हाथो से उनको निवाला खिलाया अब इसको देखकर ट्रेंड बना और सभी ने एकदूसरे को खिलाना शुरू कर दिया। असल मजा तब आया जब मैंने अभिराज को मिर्ची ही खिला दी और बेचारा बंधू प्रेम में खा भी गया। फिर जब लगा के अब खाना हद से ज्यादा खा चुके उसी समय भाभी जी ने गाजर का हलवा ला दिया, अब पहले तो खाने का मन ही न किया। लेकिन फिर भी मैंने खानापूर्ति के लिए थोडा सा लिया और अभिराज ने भी वही दोहराया जबकि उसका भी मन भर चूका था। अब हलवा इतना ज्यादा स्वादिष्ट बना था के मैंने दो तीन बार मांग के खा लिया और अभिराज जो शायद संकोच कर रहा था उसने भी मुझे देखकर हिम्मत करते हुए दुबारा लिया और देखते ही देखते आधा हलवा हम दोनों ही चट कर गए। खाने के बाड़ अब कल की योजना बनानी थी। सभी एकजुट हुए काम शुरू हुवा प्लानिंग बनी। सबको उनके उनके हिस्से का रोल दे दिया गया। और यही अमित जी के कवी होने की बात भी पता चली जब उन्होंने दो बहुत ही बेहतरीन कविताएं सुनाई। अब जब सब कुछ हो गया तब विश्लेष्ण शुरू हो गए साहित्य पर,आदित्य भाई ने बकलोल में प्रयुक्त कुछ अनावश्यक शब्दों पर चर्चा शुरू की और महफ़िल जम गई। मजा आने लगा था, अब चर्चा ने बहस का स्वरूप ले लिया तो भाभी जी ने आदित्य भाई को सो जाने का आदेश किया और उस आदेश का पालन भी हुवा। और इस तरह हम चौथे विश्वयुद्ध को बचा गए जो संभावित था।
सब निपटाकर रात २ बजे सोना हुवा और सुभ जल्दी सभी उठ कर रेडी भी हो गए। आदित्य भाई पुरे जोश में थे और सबको लापरवाहियो पर घुड़क रहे थे। जो भी सुस्त दिखता उसे डांट अवश्य पडती,मै,मिथिलेश और शुभानन्द जी भी उनकी डांट का शिकार हुए। खैर छोले भठूरे का तगड़ा नाश्ता करके हम सभी अब आयोजन स्थल की ओर बढ़ गए। मोहित जी का फोन आया पता चला के वे आयोजन स्थल पर पहुँच चुके है। हम तीनो सबसे पहले आगे निकले। और मोहित जी से जाकर मिले। मोहित जी से यह मेरी दूसरी मुलाक़ात थी शुभानन्द जी की पहली और मिथिलेश शायद दो तीन बार मिल चुका था। शुभानन्द जी अब तक हमारी संस्था में केवल मुझे ही सबसे तगड़ा मानते आये थे किन्तु मोहित जी को देखकर उनका वहम टूट गया।
अब साढ़े दस होने को थे मोहित भाई से कोई औपचारिकता करनी ही नहीं थी। वे तो अपने ही है। अब मैंने और मिथ ने बैनर वगैरह लाने का जिम्मा लिया और निकल लिए। शुभानन्द जी और मोहित जी ने स्थल की कमान सम्भाली।
जब हम प्रिंटिंग वाले के पास पहुंचे तो वह बंद दिखा, अब परेशानी के बल मिथिलेश के और मेरे माथे पर दिखने लगे के तभी प्रिंटिंग वाला आया और उसने दकान खोलकर बैनर निकाला और बोला तैयार करने में कुछ देर लगेगी। अब कोई और रास्ता था ही नहीं, ग्यारह बजने को थे फिर बीस पच्चीस मिनट में जब बैनर बना तो उसकी हाईट और साइज देखकर हैरान हो गया इतना बड़ा लेकर कैसे जायेंगे? मिथिलेश ने और मैंने किसी तरह से बैनर को ई रिक्शा पर टांगा और ऐसे ही आयोजन स्थल की ओर बढ़ गए। जब आयोजन स्थल पहुंचे तो वहा एक लडकी को देखकर चौंक गए। अबे मिथिलेश अपने पाठको में लडकियाँ भी है क्या? या ये कही और आई है? मिथिलेश की जौहरी नजरो ने लडकी को आयोजन स्थल के बैनर की तस्वीर खींचते देख लिया और बोल उठा हां आयोजन के लिए ही आई है। फिर मै बिना किसी भाव के उतरा और सीधे बैनर उतार कर लाद लिया और हम अंदर पहुँच गए। वहा पहुंचकर हमने बैनर को बैक स्टेज पर फिट करने का पूरा प्रयास किया किन्तु असफल रहे। तभी सबसे पहले कुलविंदर सोना सिंग भाई जी पहुंचे। हम सभी उनसे गर्मजोशी से मिले तो उन्होंने बैनर फिट करने के लिए बैनर को तिरछा करने को कहा। उनके सुझाव पर अमल करते ही बैनर फिट हो गया। उसके बाद एक स्टैंडी पर पोस्टर लगाने में जो माथापच्ची हुई वो देखने लायक थी। तब तक शम्भु भाई अपने साजोसामान के साथ पहुँच चुके थे। उन्हें कार्यक्रम के सारे क्षणों को कैमरे में कैद करने का जिम्मा दिया था। मै उनसे मिला उनके साथ ही साथ अलाहाबाद अंशु धुसिया भाई भी आये थे। अंशु भाई बड़े जोशीले और खतरनाक आवाज के स्वामी थे। इनसे भी पहली बार मिलना हुवा।
मैंने प्रथम बार कैनवस शूज पहने हुए थे जो समतल होने के कारण मुझे थोडा परेशान से कर रहे थे और मैंने पैरों को घिसटते हुए मूनवाल्क करने की नाकाम कोशिश की। शम्भु भाई देख रहे थे तो मैंने उनसे पूछा “ मूनवाक” करके दिखाऊ?
उन्हें वाकई यह सच लगा और उन्होंने हैरानी से पूछा भी “ आपको आता है?” मै हंसते हुए कहा के बकलोली कर रहा हु भाई।
अब सब कुछ व्यस्थित हो गया था,मंच कुर्सिया माइक,साउंड सब चेक हो गया। लोग आने लगे। फिर अभिराज ने उस समय तक कार्यक्रम में आई एकमात्र कन्या से परिचय करवाया उनका नाम तन्वी था। मै वैसे तो बड़ा बकबकिया रहू किन्तु महिलाओं को देखते ही शर्म का पुतला बन जाता हु और मै चुपके से वहा से असहज होते हुए खिसक लिया। अब सभी पाठक, श्रोता पहुँच गए थे और मंच की जिम्मेदारी मोहित जी और मिथिलेश ने संभाल ली। सभी मेहमानों का स्वागत आरंभ हुवा, मै भी जिससे मिलता उन्हें गले लगा लेता।
क्रमश:
 

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

बातें किताबें मुलाकातें भाग ३

बातें किताबें मुलाकातेंभाग ३पिछली दो पोस्ट

शुभानन्द जी, मै और मिथिलेश ,रेप्लिका प्रेस की इमारत के सामने 

में मैंने जिक्र किया किस तरह मै और शुभानन्द जी सूरज पॉकेट बुक्स के कार्यक्रम के लिए मुंबई से दिल्ली पहुंचे और आदित्य जी एवं बाकी लेखको, कलाकारों से मिले।अब मै,मिथिलेश और शुभानन्द जी कैब में सवार थे। हमे दिल्ली से सोनीपत पहुँचने में काफी समय लगना था। हम पहले भी एकदूसरे से एक साथ मिल चुके थे, इसलिए सूरज पॉकेट बुक्स की टीम में हम तीनो की बॉन्डिंग भी सबसे अलग और मजबूत है क्योकि हम शुरुवात से साथ जुड़े है और एकदूसरे का काम देखते सराहते आये है। शुभानन्द जी के सेल्फ पब्लिश नोवेल्स से मिथिलेश की वो भयानक रात और जस्ट लाइक दैट, के बाद मेरी खुद की पुस्तक इश्क बकलोल और एस सी बेदी,परशुराम जी के बाद अंतर्राष्ट्रीय साहित्य के अधिकार से लेकर अब एक स्वतंत्र और निर्भर पब्लिकेशन तक का सफर मैंने या कहू हमने साथ साथ देखा है इसलिए हमारी ट्यूनिंग सबसे अलग है ( भले अपने मुंह तारीफ़ कर लू, इतना तो बनता है ) तो यहाँ इस भूमिका से आशय यह था के दिल्ली आने के पश्चात पहली बार हम तीनो सही मायने में एक साथ थे। आदित्य जी के घर पे भी साथ ही थे किन्तु वहा हम सभी अलग अलग तैय्यारियो एवं भागदौड़ में लगे हुए थे। तो अब हमने अपने अचीवमेंट्स पर गौर किया और यह कोई अतिश्योक्ति नही थी। यदि आपने जर्रे से शुरुवात करके एक इमारत खड़ी की हो तो स्वाभाविक है के आप खुश होंगे, भाऊक होंगे, आपका अधिकार बनता है।हम तीनो प्रसन्न थे। मिथिलेश जी और शुभानन्द जी यही बाते कर रहे थे के हमने कैसे शुरुवात की और आज हम दिल्ली में अपना एक स्वयम का छोटा सा कार्यक्रम करने जा रहे है। सभी के मन में उल्लास तो था ही। साथ ही साथ कल होने वाले आयोजन की कल्पना से ही रोम रोम पुलकित हो रहा था और उत्सुकता चरम पर थी। आज रात नींद तो आनि ही नहीं थी। हमारी बाते चल ही रही थी के मुझे एक गाँव का साइन बोर्ड दिखाई दिया और मै चौंक पड़ा।“अरे मिथिलेश! वो देखो ‘बकलोली’ गाँव।“ मैंने हैरत से कहा तो दोनों ने उधर देखा और पहले उन्होंने भी वही पढ़ा फिर जब वे समझे तो हंस पड़े के ये बकलोली नही “बकौली” था।“अरे का पाण्डेजी हर जगह बकलोली ही नजर आ रही है आपको।“ कहकर मिथिलेश हंस दिया,और हम भी शामिल हो गए। अब किसी भी बेवकूफी या मजाकिए वाकये के लिए “बकलोली” शब्द हमारी पूरी टीम का तकिया कलाम बन चुका था। मै मुंबई से निकलने के पश्चात अब तक कई बार बकलोली शब्द सुन चूका था। यहाँ तक के अभी मुंबई पहुँचने के बाद भी एक पोस्ट पर मिथिलेश जी ने कोई गलत कमेन्ट कर दिया था जो शायद कमजोर नेटवर्क के कारण वो डिलीट नही कर पा रहे थे तो उन्होंने मुझे फ़ोन किया “ अरे देवेन भाई एक ‘बकलोली’ हो गई यार। एक गलत कमेन्ट आ गया है आपकी पोस्ट पर वह डिलीट नही हो रहा आप कर दीजिये।“ तो मै पहले हंसा और फिर वह कमेन्ट डिलीट कर दिया। खैर ! बातों का रुख बकलोली की ओर से हटा कर यात्रा की ओर करते है।तो गूगल मैप का सहारा लिए हुए हम लगभग सवा या डेढ़ घंटे में रेप्लिका प्रेस के दिए पते पर पहुंचे। वह अपेक्षाकृत बड़ा कमर्शियल काम्प्लेक्स था जहा रेप्लिका के दो बड़े ऑफिस थे। हमे दुसरे में जाना था और हमने कई लोगो से रेप्लिका के बारे में पूछा तो उन्होंने अनभिज्ञता दिखाई। फिर एक जगह दो बंदे जा रहे थे, गाडी रुका कर जब उनसे पूछा तो पहले वे अचम्भे में पड़े के ऐसा कुछ यहाँ नहीं है, फिर जब प्रिंटिंग वगैरह का उल्लेख किया तो एक व्यक्ति चौंका “ रिपालिका!!!” हमने कहा हां “रिपालिका” तब उन्होंने आगे जाकर लेफ्ट लेने के लिए कह दिया। हम बढ़े और हमे यह ज्ञान हुवा के लोग रेप्लिका को रिपालिका भी कहते है लोकल एक्सेंट में। अब हम रेप्लिका के सामने खड़े थे। हमने कैब वाले को वेटिंग पर रखा और पहले गेट की ओर बढ़े तो वहा उपस्थित सिक्योरिटी ने दुसरे गेट पर भेजा, अब वह गेट लगभग ढाई सौ मीटर दूर था और हम फिर वहा गए तो वहा उपस्थित सुरक्षा प्रहरी ने हमे उसी गेट पर जाने को कहा जहा से हम आये थे। अब हमें हंसी भी आ रही थी और खीज भी शुभानन्द जी ने तब रेप्लिका में फोन किया। हमें अंदर बुलाने का आदेश लेकर एक व्यक्ति आये और हमने सबसे पहले तो प्रेस की इमारत के साथ एक सेल्फी खिंच ली ताकि यादो में सहेज सके। अब कुछ ही देर में हम प्रेस में थे, शुभानन्द जी ने जिनसे बात की थी वे हमसे काफी गर्मजोशी से मिले। हम तीनो पहली बार किताबे प्रिंट,बाइंडिंग और डिजाइन होते अपनी आँखों से देख रहे थे। एक तरह से वह हम जैसे लेखक कम पाठको के लिए स्वर्ग था। हम तीनो कौतुहुलता से पुस्तको को बनते देख रहे थे, कही लोग पृष्ठों को जोड़ रहे थे, कही मशीन में चमकदार पन्नो पर विभिन्न कवर्स प्रिंट हो रहे थे। कही कटिंग हो रही थी कही पैकिंग हो रही थी, हर ओर वातवरण में कागज़ और स्याही की खुशबु फैली हुई थी। खैर हम यहाँ जिस काम के लिए आये थे पहले वह निपटाना आवश्यक था। हम तीनो अब मीटिंग रूम में थे और पुस्तको के ले आउट, डिजाइन, आवरण,प्रिंटिंग आदि से सम्बंधित विवरण ले रहे थे और ज्ञान वृद्धि कर रहे थे। हम इस तरह से व्याकुल थे जैसे किसी बच्चे को किसी मिठाई के दूकान में खुला छोड़ दिया गया हो। हमने हर सम्भव प्रश्न किये और उन महाशय ने बड़ी ही विनम्रता से हमारी हर उत्सुकता को शांत किया। उसके बाद जब तक हमारी पुस्तके पैक होती तब तक उन्होंने हमे अपना प्रेस दिखाने के लिए आमंत्रित किया, हमे यही तो चाहिए था। हम निकल पड़े और वे हर चीज बताते, फिर एक विशेष तरह की डिजाइन के लिए मिथिलेश ने जानकारी ली तो उन्होंने हमे एक उदाहरण दिखाने के लिए बुलाया, वहा उनके कुछ और बंदे आये और उन्होंने मिथिलेश और मेरी ओर देखकर असमंजस सी नजरो में देखा, मानो पहचानने का प्रयास कर रहे हो। फिर उन्होंने पुछ ही लिया “ ये दोनों ऑथर्स है ना ?” मै और मिथिलेश बड़े प्रसन्न हुए के यार ये देखो ये है असली कमाई। एक पहचान! जो छोटी ही सही लेकिन एक स्वतंत्र पहचान है जो लेखन की वजह से है। शुभानन्द जी ने अपना हुलिया बदल रखा था उन्होंने मूंछे रखनी शुरू की थी और उनकी तस्वीरो में वे क्लीन शेव्ड है इसलिए उन्हें वे न पहचान पाए तो मिथिलेश ने जब उनका परिचय कराया तो वे भी हैरान हो गए और काफी प्रसन्न भी दिखे। फिर हमारी पुस्तके पैक हो गयी और अब हमे निकलना भी था। ड्राइवर ने भी फोन करना शुरू कर दिया, बेचारे को घबराहट हो गई होगी के भाग तो नहीं गए बिना पेमेंट दिए। मैंने फ़ोन रिसीव करके उसे समझाया के हम आ ही रहे है। तब हमने समय देखा तो हमे एक घंटा हो गया था प्रेस में आये हुए जबकि हमारे अनुमान से केवल पन्द्रह या बीस मिनट ही हुए होंगे। यहाँ आकर समय का पता ही नहीं चला। अब हम लोडिंग एरिया में थे और ख़ुशी इतनी थी के उन्हें बक्से लोड करवाने का भी अवसर नहीं दिया और हमने खुद ही बक्से उठा कर कैब में रख दिए। उनका आदमी सर,सर अरे नहीं सर कहता ही रह गया और हमने सब भर दिया। मैंने कहा भी “ये करने दो भाई, बाड़ में हमे कहने का अवसर भी मिलेगा के हमने इसमें अपना पसीना बहाया है।“ सब हंस दिए और ख़ुशी ख़ुशी सबसे विदा हो लिए।मैंने मिथिलेश ने कहा “मिथिलेश यही जॉब के लिए अप्लाई कर दे यार।“ मिथिलेश मुस्कुराया और बोला“जॉब की छोडो! मै तो दिल्ली में ही अपने ऑफिस के सपने देख रहा हु।“ हम तीनो इस बात पर मुस्कुराए। किन्तु हमें ही पता था के अब तक की हुई हर चीज हमारे लिए सपना ही थी। चाहे पुस्तक छपवाना हो, पब्लिशर के तौर पर शुरुवात करना हो, बड़े लेखको के साथ काम करना हो या अंतर्राष्ट्रीय साहित्य के अधिकार लेना हो या फिर अपना खुद का आयोजन दिल्ली में करना हो। यह सभी एक समय नामुमकिन सा था लेकिन हर सपना स्टेप बाई स्टेप पूर्ण हुवा तो मिथिलेश की इस बात को हमने ख़ुशी से स्वीकार किया। अब हम वापस दिल्ली की ओर थे और रात हो चुकी थी। सफर के दौरान ही मोहित जी का फोन आया और हमने कल के लिए कुछ जरुरी विषयों पर चर्चा की, मोहित जी ने बताया वे दस बजे तक सीधे हॉल पहुँच जायेंगे।अब हम घर पहुँचने वाले थे ......क्रमश:x
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शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

बातें,किताबें,मुलाकातें भाग 2


दिल्ली में पहला दिनपिछली पोस्ट में जिक्र था के किस तरह से मुंबई से दिल्ली 

आने की योजना पर ग्रहण लगा किन्तु फिर भी हम पहुँच ही गए

बातें,किताबें,मुलाकातें भाग l 
हम इवेंट हॉल का जायजा लेने पहुंचे 
 अब चूँकि आदित्य जी से मिल चुके थे, उनकी गर्मजोशी और अपनापन भी देख चुके थे। तो दिल से अब संकोच भी समाप्त हो गया। मिथिलेश जी ने अमित श्रीवास्तव और अभिराज भाई से परिचय कराया। मिथिलेश ने कहा भी के जैकेट पहन लीजिये ठंड बहुत है। किन्तु मैंने मना कर दिया, उपर से उन्होंने मुझे सैंडल पहने देख लिया। 
सभी ने एक साथ तस्वीरे ली 
“देवेन भाई यह तो न चल पाएगी ठंड में। घर चलो पता चलेगा जब जुते पहनने होंगे।” मिथिलेश ने कहा तो मै मुस्कुरा दिया। तब पता चला के अभिराज इस पूरी मुलाक़ात की विडीयोग्राफी कर रहा था, किन्तु आदित्य भाई इतनी तेज रफ्तार से मिलने के लिए भागे थे के कैमरे ने उन्हें कैप्चर ही नहीं किया था। खैर! हम घर पहुंचे तो आदित्य जी ने हमे एक कमरे में बिठाया, मै और शुभानन्द जी अभिराज और अमित जी के साथ सोफे पर बैठे थे की भाभी जी आ गई। इन्होने भी सबका स्वागत बड़े जोशो खरोश से किया और उन्होंने भी मेरी पोलो टी शर्ट देखकर डांट लगा दी के “ठंड लग जायेगी, जैकेट पहन लो।” और वाकई में आदित्य जी के घर का तापमान बाहर के तापमान के मुकाबले कही ज्यादा ठंडा था। लेकिन मैंने फिर भी मना कर दिया। फिर चाय नाश्ता हुवा, भाभी जी ने लड्डू लाये थे और वे लड्डू मुझे इतने स्वादिष्ट लगे के सारा संकोच भुला कर मैंने तीन चार लड्डू तो ठूंस ही लिए। अब इसके पश्चात हमें हमारा रुकने का कमरा दिखाया गया। वह कमरा हम जैसे नवलेखको एवं पाठको के लिए कमरा न होकर एक स्वर्ग जैसा था। वहा दो अलमारिया भर कर उपन्यासों का अद्भुत संग्रह भरा पड़ा था। जिसे देखकर आँखे फट फटने को उतारू हो गई, किन्तु उपन्यासों के संग्रह से ज्यादा मेरा ध्यान खिंचा कॉमिक्स के संग्रह ने। मैंने उतावलेपन में सारी कॉमिक्स उलट पुलट कर देख डाली, एक से एक रेयर और दुर्लभ कॉमिक्स देख कर मन ललचा गया। अमित जी ने कहा भी के तुझे जो पसंद आये वो ले जा, सब अपने भाइयो के लिए ही है। अब ये तो वो बात हुई के आप महीनो के भूखो के सामने छप्पन भोग परोस दो। और मैंने यह बात उनसे कही भी। किन्तु मैंने कोई कॉमिक्स नहीं ली क्योकि एक संग्रहकर्ता किस तरह अपने संग्रह में एक एक पुस्तक जोड़ता है,कितनी शिद्दत से एक एक पुस्तक के लिए भागदौड़ करता है वो सब मै जानता था। और इतनी आसानी से उनके संग्रह से मै बिना मेहनत कुछ ले जाऊ यह मुझे सही नहीं लगा। फिर हम सबने अपने अपने बैग्स रखे और उसके बाद सबसे अच्छे से मिले। भाभी जी ने गर्मागर्म स्वादिष्ट चाय और नाश्ता कराया तो रही सही झिझक भी पूर्णतया खत्म हो गई। उनके व्यवहार और अपनेपन को देखकर मै भूल ही गया के मै होटल में रुकनेवाला था। अब चूँकि सब निपट चूका था, और कल इवेंट था और तैय्यारी करने के लिए केवल हम चार पांच लोग ही थे इसलिए सब काम निपटाने थे आज के आज। अब मै और शुभानन्द जी इवेंट हॉल देखना चाहते थे,लेकिन पहले हमे माइक और साउंड का बंदोबस्त करने जाना था तो हम निकल लिए। और मै फिर टी शर्ट और सैंडल पर रवाना हो गया। सभी जाकर माइक और साउंड वाले से बात करके और स्टेज का बंदोबस्त करके घर लौट आये। अब ठंड लगने लगी थी। मुझे भी मेरे हाथो एवं कान पर ठंड से गलन का अहसास होने लगा था। तो घर से निकलने से पहले मैंने जैकेट और मोज़े पहन लिए, जूते न पहने क्योकि मुझे वो काफी असुविधाजनक महसूस हो रहा था। उसी तरह हम सभी इवेंट वाले हॉल में पहुँचे और हॉल का जायजा लिया, हालांकि हॉल की तस्वीरे पहले ही आदित्य जी और मिथिलेश व्हाट्स अप पर भेज चुके थे। किन्तु असल में हॉल काफी बड़ा और अच्छा लगा। हर लिहाज से यह उत्तम जगह लगी। फिर हमने जगह देखकर हर चीज के लिए सही जगह तय की, माइक कहा होगा,स्टेज कैसे लगेगा, पाठक कहा बैठेंगे,बैनर्स कहा लगेंगे और स्टैंडी कहा लगायेंगे। पुस्तके कहा होंगी। पुस्तके सम्भालने की जिमेदारी अभिराज को दे दी गई। उसने सहर्ष यह जिम्मेदारी स्वीकार कर ली। फिर हम घर पहुंचे, बैनर्स,पोस्टर्स अब तक प्रिंट नही हुए थे और शाम के ४ बजने को थे। मिथिलेश लगातार निशांत से सम्पर्क में था। निशांत ही सारे बैनर्स,पोस्टर्स की डिजायनिंग कर रहा था। इतने सारे आर्टिस्ट,लेखको को एक बैनर में समेटने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही थी। निशांत भी बड़े ही शांत तरीके से सब संभाल रहा था। वह मौजूद न होते हुए भी अपने हिस्से का काम बखूबी संभाल रहा था। हडबडी में पता चलता किसी लेखक की तस्वीर छूट गई है तो कभी पता चलता किसी लेखक की तस्वीर ही नहीं है किसी के पास। इसके बावजूद शाम तक डिजाइन फाइनल हो गया। बाकी इन कामो के लिए मेहनत हम कर रहे थे और इस मेहनत के लिए पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध करवाने का कार्य आदित्य भाई और डॉली भाभी संभाल रहे थे। भाभी जी हर एकाध घंटे पर चाय या कुछ न कुछ खाने पिने की वस्तु लेकर पहुँच जाती और इस तरह घुलमिल जाती के किसी को पता ही नही चलता के हमारे बिच में कोई ऐसा भी है जिससे हम पहली बार मिल रहे है ।फिर डिजायनिंग फाइनल हुई और हम पांचो प्रिंटिंग के लिए निकल पड़े, अब हवा में ठंडक बढ़ चुकी थी तो मैंने भी सैंडल हटा कर जूते पहनने उचित समझा। और हम कुछ ही देर की पैदल यात्रा के पश्चात बैनर वाले के पास पहुंचे। वहा उसे कुछ हिदायते दी गयी तो पता चला के प्रिंट सुबह से पहले ना मिलनेवाले। और सुबह ग्यारह बजे से ही लोगो का आना जाना शुरू हो जाने वाला था। अब थोड़ी फ़िक्र हुई। उसी समय शुभानन्द जी को पता चला के रेप्लिका प्रेस से कल के लिए जो किताबे रिप्रिंट होकर आज आनेवाली थी वो आज नही आ पाएंगी। नए सेट की पुस्तके तो पहुँच ही चुकी थी किन्तु रिप्रिंट की आवश्यकता भी थी। फिर शुभानन्द जी और मैंने तय किया के हम अभी के अभी सोनीपत स्थित रेप्लिका प्रेस जाकर रिप्रिन्ट्स कलेक्ट करेंगे। तो हमने लगे हाथो कैब बुक कर ली,दस मिनट में कैब पहुंची और हम सवार हुए तो अमित भाई आये और हमे जाते देखकर कहा।“मै भी साथ चलूँगा।”मिथिलेश जी ने पूछा “कहा ?”उनका जवाब आया” मुझे नही पता लेकिन चलूँगा।” उनके इस भोलेपन पर हमे बड़ी हंसी आई और उन्हें समझा दिया गया के कैब में हम ३ आदमी और ड्राइवर है, आते समय पुस्तको के बक्से भी होंगे तो आप यही पर रहकर तैय्यारी कीजिये हम आते है।”अमित जी थोड़े से निराश दिखे लेकिन अपने आदमी थे तो वापस आकर मनाना कोई मुश्किल ना लगा। और हमारी सवारी सोनीपत की ओर कुंच कर गई जो हरियाणा में थी।वहा का अनुभव भी बड़ा दिलचस्प रहा, बाड़ में हम खुश हुए के अच्छा हवा उन्होंने पुस्तके नहीं भेजी।

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शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

बातें,किताबें, मुलाकातें भाग 1

सूरज पॉकेट बुक्स के संस्थापक शुभानन्द जी और मै मुंबई से राजधानी में 
दिल्ली में २७ जनवरी ३० जनवरी तक बिताया समय जीवन का एक अविस्मरणीय समय रहा, जिसने बहुत सी प्यारी यादो का गुलदस्ता सा दियाl और बहुत से मित्र भी, जिनसे पहली बार मिलकर भी ऐसा प्रतीत ही नही हुवा के पहली बार मिल रहे हैl इन यादो को शब्दों में उतारने का प्रयास कर रहा हु, किन्तु इतनी सारी चीजों को एक ही बार में लिखना मुश्किल है, इसलिए इसे कुछ कड़ीयो में पोस्ट कर रहा हुl

दिल्ली के लिए प्रस्थान. 1



सूरज पॉकेट बुक्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम “बाते किताबे मुलाकातें” के लिए अचानक से दिल्ली जाने की योजना बनीl मै अभी हाल ही में दो महीने पहले ही दिल्ली से लौटा था, किन्तु अब दुबारा आनन फानन में मिथिलेश ने योजना बना ली और फोन भी कर दिया के देवेन भाई और शुभानन्द जी आपको आना हैl
अब जल्दबाजी में फ्लाईट की टिकट भी बुक हो गईl चूँकि यह मेरी पहली फ्लाईट यात्रा होती इसलिए भी रोमांचित थाl दिल्ली में रहेंगे कहा? यह प्रश्न था, तो इसके लिए मैंने दिल्ली में मौजूद अपने सूत्रों से होटल में रहने की योजना बनाई जिसे शुभानन्द एवं मिथिलेश ने सीधे नकार दियाl वे आदित्य वत्स जी के घर रुकने की योजना बना चुके थेl आदित्य जी से मेरा सामना एक उपन्यास सम्बंधित ग्रुप में हुवा थाl यहाँ सामना इसलिए लिखना पड़ा क्योकि जिस तरह से हमारी तनातनी और बहस हुई थी, उसे मुलाक़ात तो हरगिज नही कहा जा सकता थाl किसी बात पर हमारी बहस हुई थीl और मैंने अपने मन में आदित्य जी की एक नकारात्मक छवि गढ़ ली और इनसे पर्याप्त दुरी बनाने लगाl अब जब इन्ही के यहाँ रुकने की योजना बनी थी तो मुझे झिझक हुई और मैंने कहा के मै होटल में रुकुंगा आप लोग वहा रुक जाइएगाl
शुभानन्द जी और मै नई दिल्ली स्टेशन पर 
फिर पता नहीं क्या हुवा,शायद मेरी झिझक आदित्य जी ने भांप ली और इनबॉक्स में मैसेज करके नम्बर लिया और फोन कियाl फोन पर हुई बातो से हमारी आपसी गलतफहमियां दूर हो गई किन्तु फिर भी मन की शंका न जा रही थी और मेरा वहा रुकने का निर्णय अब भी डावांडोल ही थाl खैर! २६ जनवरी का वह दिन भी आ गया जब हमे दिल्ली के लिए निकलना थाl शाम को ८ बजे फ्लाईट थी, शुभानन्द जी और मैंने रास्ते में मिलने की योजना बना लीl जितना याद हो सका उतना जरुरी सामान भी पैक कर लिया, तब तक ग्यारह बजे शुभानन्द जी ने मैसेज किया के कोहरे के कारण फ्लाईट रद्द हो गयीl अब प्रश्न सामने था के क्या करे? २८ को इवेंट था उससे पहले पहुंचना बेहद जरुरी थाl शुभानन्द जी ने तुरंत उसी दिन की राजधानी का टिकट निकाल लियाl खैर! जहा दो घंटे में दिल्ली पहुंचना था वहा १५ घंटे का सफ़र हो गया, दूसरी फ्लाईट बुक करने का जोखिम भी नही उठा सकते थे के कही वह भी कैंसिल न हो जायेl यह भी अच्छा ही हुवा, क्योकि इससे पहले मै शुभानन्द जी से एक ही बार मिला थाl लेकिन उस समय हम एकदूसरे को अच्छे से नही जान पाए थे तो एक साथ १५ घंटे के सफ़र में एकदूसरे से वाकिफ होने का बढिया अवसर भी मिल गया थाl
मै एक घंटे पहले ही स्टेशन पहुँच गयाl शुभानन्द जी तिलक नगर से बैठ चुके थे और मुझे बोरीवली सुविधाजनक था इसलिए मै बोरीवली स्टेशन पहुँच गयाl साढ़े पांच बजे ट्रेन आई और शुभानन्द जी दरवाजे पर ही खड़े मिलेl बड़ी ही गर्मजोशी से हम दोनों मिले और अपना अपना आसन ग्रहण कियाl
फिर जो बातों का सिलसिला शुरू हुवा तो खत्म होने का नाम ही ना लियाl नाश्ता हो गया, खाना हो गया लेकिन हमारी बाते खत्म ही न हो रही थी यहाँ तक की पूरी बोगी सो गईl आखिरकार हमारे सहयात्री बुजुर्ग ने हमसे हाथ जोड़ लिए के बेटा अब बस भी करोl तब कही जाकर हम रुके और सो गएl
मिथिलेश बार बार मैसेज कर कर के अपडेट्स दे रहा थाl बता रहा था के काफी ठंड पड़ रही है, जैकेट्स वगैरह पहन लो,तैय्यारी कर लोl फिर अगले दिन ट्रेन एक घंटे लेट हुई और हम पौने ग्यारह बजे नई दिल्ली पहुंचेl शुभानन्द जी ने जैकेट पहन लिया था किन्तु मै अब भी केवल पोलो टी शर्ट में ही थाl मुझे ठंडी हवाए महसूस हुई लेकिन इतनी भी नही के जैकेट पहन लूl हमने कैब बुक की, मिथिलेश ने लाइव लोकेशन भेजी जिसके सहारे हमने गलत रास्ता पकड़ लियाl
गंतव्य की ओर प्रस्थान 
मिथिलेश ने हमारी भेजी हुई तस्वीरे देखि और मुझे टी शर्ट में देखकर कहा के पाण्डेयजी आपको भले ही वहा ठंड न लग रही हो,लेकिन आदित्य जी के घर आकर आपको अहसास होगा ठंड काl मैंने बात हंसी में उड़ा थीl अब हम सही जगह पहुँच तो गए थे किन्तु घर का पता ना मिल पा रहा थाl मिथिलेश को फोन किया तो वह भी पूरी टीम लेकर हमारी खोज में चल पड़ाl हमने कैब वाले को भी हैरान होते देख पैसे देकर चलता कर दिया और बैग लेकर बताई हुई गली की ओर बढ़ गए तब वहा कुछ ही दुरी पर मिथिलेश दिखा, आदित्य जी उनके साथ थेl मिथिलेश से दो बार मिल चुका हु तो उसे न पहचानने का प्रश्न ही नही उठता थाl आदित्य जी की भी शक्लो सुरत ऐसी थी के उन्हें भी एक ही बार में पहचान लियाl अब आदित्य जी की नजरे हम पर पड़ी और वे तीव्र गति से दौड़ते हुए आगे बढ़े, मै घबरा कर पीछे हट गया के कही टकरा कर गिरा न देl वे दौड़ते हुए ही आये और शुभानन्द जी से गले मिले और हमें भी लपेटे में ले लियाl बड़ी ही गर्मजोशी एवं अपनेपन से उन्होंने हमारा स्वागत कियाl तब तक मिथिलेश ने हमारा परिचय अभिराज ठाकुर एवं अमित श्रीवास्तव जी से भी करा दिया थाl मै सभी से गले मिला और फिर सबने मिलकर हमारा सामान उठा लिया और बाते करते हुए हम आदित्य जी के घर की ओर बढ़ गए......

क्रमश: 

रविवार, 18 जून 2017

चालीसा का रहस्य : पुस्तक चर्चा l


जहा तक मुझे याद है मैंने इससे पहले फिक्शन में किसी महिला लेखक की पुस्तक नही पढ़ी है, अधिकतर रोमांस लेखन में सक्रियता दिखाती है, और रोमांस ने मुझे कभी इतना आकर्षित नही किया, l
इसी दौरान ‘’सूरज पॉकेट बुक्स’’ से प्रकाशित पुस्तक ‘’चालीसा का रहस्य” के बारे में सुना, यह पुस्तक पहले अंग्रेजी में प्रकाशित हुयी थी, मेरी दिली इच्छा थी के यह पुस्तक हिंदी में अनुवादित हो l
और ऐसा हुवा भी, पुस्तक हिंदी में प्रकाशित हुयी जिसका अनुवाद भी एक महिला ने ही किया,”सबा खान” जी ने, और पुस्तक पढ़ते समय यह लगा ही नही के यह पुस्तक मूल रूप से अंग्रेजी में थी और यह हिंदी अनुवाद है, ऐसा लगा मानो यह पुस्तक हिंदी में पुन: लिखी गयी हो, हिंदी में भी पुस्तक को जस का तस बनाए रखने और दिलचस्प भाषा शैली प्रदान करने के लिए “सबा” जी प्रशंषा की हकदार है l आते है पुस्तक पर और उसके विषय पर,पुस्तक एक मेडिकल माइथोलोजी थ्रिलर है, मेडिकल शब्द का प्रयोग पहले मुझे समझ में न आया के भला यह कौन सा जेनर आ गया ? किन्तु जब उपन्यास खत्म किया तब लगा के वाकई यह बिलकुल सही शब्द था l
उपन्यास की कहानी है शोधछात्र ‘संजीव त्रिपाठी’ की, वह सुप्रसिद्ध डॉक्टर और शोधकर्ता ‘अंजना शर्मा’ के मार्गदर्शन तले अपनी एक थिसीस पर लगा हुवा है,उस थीसिस के पीछे संजीव की अपार मेहनत और गहन शोध छिपी हुयी है और उसमे उसका सम्पूर्ण भविष्य निहित है, किन्तु थीसिस पूर्ण होने से पहले ही संदिग्ध परिस्थितियों में ‘अंजना शर्मा’ की मृत्यु हो जाती है l
अब संजीव एक ओर दुखी भी है तो दूसरी ओर थीसिस के न मिलने से परेशान भी,क्योकि वह अंतिम प्रारूप के लिए ‘अंजना’ के पास दी गई थी,
लेकिन संजीव को हैरानी तब होती है जब उसे पता चलता है के अंजना ने उसके लिए एक बॉक्स और हनुमान चालीसा की एक प्रति को रख छोडी है, संजीव उस रहस्यमयी बॉक्स को हासिल तो कर लेता है किन्तु वह बॉक्स खोलने की प्रक्रिया काफी जटिल हो जाती है, जिसके लिए उसे कुछ राज सुलझाने है,और उन सारे प्रश्नों के उत्तर और उनके गूढ़ इस हनुमान चालीसा की पंक्तियों में है l
और यहाँ से उसका सफर शुरू होता है,पंक्ति दर पंक्ति उसे नए नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है,जिसमे उसके साथी बनते है,भूमिजा और पवन जो अंजना के रिश्तेदार है, इस पुरे सफर में कई उलझाऊ मोड़ आते है,कई रहस्य खुलते है,कई घटनाए द्रुत गति से घटती है, जिसके ताने बाने अंत में एक जगह आकर मिलने है, l
क्या संजीव अपनी थीसिस पूर्ण कर सका ? थीसिस में ऐसा क्या था जिसके लिए संजीव व्यग्र था ? हनुमान चालीसा की पंक्तियों में भला कौन से रहस्य छुपे थे ? ऐसा क्या था जिसे इतना छुपाकर रखा गया था ? इन सारे प्रश्नों के उत्तर बेहद दिलचस्प तरीके से पुस्तक में पृष्ठ दर पृष्ठ मिलते है l
194 पृष्ठों में फैले इस उपन्यास की कहानी,बेहद दिलचस्प है और कही भी खिंची हुयी नही लगती है, घटनाए बड़ी तेजी से निकलती है जिस वजह से उपन्यास में गति पर्याप्त है, हनुमान चालीसा को आधार बना कर रहस्य का ताना बाना बुनना और उसे पंक्ति दर पंक्ति रचना वाकइ बेहद शानदार है, उपन्यास में अतिरंजकता से बचा गया है, जो के अच्छा लगता है l

बढ़िया शुरुवात,लेखिका डॉक्टर रुनझुन सक्सेना एवं अनुवादिका सबा खान जी को बधाई इस दिलचस्प उपन्यास के लिए l   

बुधवार, 14 जून 2017

परोक्ष : शोर्ट फिल्म

जेनर : हॉरर,मनोविज्ञान l
अवधि : मात्र 12 मिनट l
शोर्ट फिल्म्स की चर्चा में आज चर्चा करेंगे “दृश्यम’’ फिल्म्स की हाल ही में यूट्यूब पर रिलीज की गई शोर्ट फिल्म “परोक्ष” की, परोक्ष को एक हॉरर जेनर में बनाया गया है,फिल्म की भाषा ‘तुलु’ है किन्तु इससे फिल्म को समझने में कोई दिक्कत नही होगी,क्योकि इस फिल्म में संवाद बहुत कम है,लगभग न के बराबर, फिल्म अंग्रेजी सबटाईटल्स के साथ है, लेकिन न भी होती तो कोई ख़ास फर्क न पड़ता l
फिल्म की कहानी दक्षिण भारत के एक गाँव की है,गाँव बेहद सुंदर है और प्रकृति ने अपनी पूर्ण हरियाली गाँव पर मानो न्योछावर सी कर दी है l
इसी गाँव के आखिरी छोर पर एक छोटा सा परिवार रहता है,जिसमे एक दम्पति अपनी बेटी के साथ रहते है, l
सबकुछ ठीक चल रहा होता है के अचानक एक दिन परिवार की महिला को पास के ताड़ के पेड़ो से डरावनी आवाज सुनाई पडती है, आवाज दिन में आती है, जिससे महिला डर जाती है और अपने पति को इस बाबत सूचित करती है,पति अपनी पत्नी का भ्रम दूर करने के लिए पेड़ो के समीप जाता है,किन्तु वही भयावह आवाज वह भी सुनता है l
वह समझ जाता है के यहाँ कुछ गडबड है,किसी तरह की अदृश्य शक्तियों का वास है, वह घबरा कर अपने साले को बुलाता है, साला अपने दोस्तों के साथ छानबीन करता है तो उसे भी डरावनी आवाजे सुनाई देती है, वह बहुत कोशिश करता है किन्तु आवाज के स्त्रोत का पता नहीं लगा पाता,और अगले दिन एक मांत्रिक को वहा भेजता है, मांत्रिक आवाज वाले पेड़ की निशानदेही करता है, और अपने कर्मकांडो पेड़ को मंत्रित कर देता है l
लेकिन तांत्रिक के जाते ही फिर से वही भयानक आवाज आती है, और इस बार न सिर्फ आवाज आती है, बल्कि महिला को एक साया भी दिखाई देता है l
फिर क्या होता है, यही मुख्य संस्पेंस है,जिसके बारे में चर्चा करना मतलब फिल्म का मजा खराब करना होगा l
फिल्म की सिनेमाटोग्राफी काफी शानदार है,फिल्माकंन हो या साउंड इफेक्ट्स, सभी शानदार है, फिल्म में जो वातावरण गढ़ा गया है वह बेहद सुंदर है,मनमोहक है,किन्तु उस सुंदर वातावरण में जब भय का वास होता है, तो वह सुंदरता एक मनहूसियत सी लगने लगती है l
कलाकारों का अभिनय जिवंत है, कम शब्दों में अधिक भाव दिखाना वाकी मंत्रमुग्ध कर देता है, विशेष तया मांत्रिक का किरदार, जो बेहद रहस्यमई है और उसके हिस्से में एक भी संवाद न होने के बावजूद उसका प्रभाव काफी तगड़ा रहा है l
फिल्म गति और दिलचस्पी लिए हुए है,कही भी आपकी नजरे यहाँ से वहा होने का अवसर नही देती , अंत तक बांधे रखती है l
और फिल्म का अंत ? बस वह अंत एक झटके में सब बदल देता है l
वक्त निकालिए और अवश्य देखिये l
देवेन पाण्डेय l 

बुधवार, 31 अगस्त 2016

पुस्तक समीक्षा : रक्षक ( ग्राफिक नॉवेल )


भाषा : इंग्लिश
पब्लिकेशन : याली ड्रीम्स क्रिएशन .
याली ड्रीम्स क्रिएशन्स के परिचय पर इससे पहले के रिव्युज में काफी कुछ लिख चूका हु ,तो इस बार बिना किसी औपचारिकता के मुख्य मुद्दे पर आते है l
याली ने भूतकाल में कई अलग-अलग जेनर पर काम किया है किन्तु इसके बावजूद एक ग्राफिक नावेल या कॉमिक्स पब्लिकेशन को विविधता भरे जेनर एवं कंटेंट के बावजूद बिना सुपरहीरो के अधुरा माना जाता है ,और याली के पास अब तक अपना कोई सुपरहीरो नहीं था l
तो इस कॉमिक्स से सुपरहीरो को लाया जा रहा है ,जो कोई सुपरहीरो नहीं बल्कि एक आम इंसान है , न वो कोई अरबपति है ,न कोई इंजीनियर न कोई एलियन ,और ना ही किसी साईंस का चमत्कार l
यह कहानी प्रस्तुत करती है एक आदमी के जज्बे को सुपरहीरोइक रूप देने की ,एक प्रेरणा की एक जज्बे की , जिसके होने के बाद किसी सुपर पॉवर की जरूरत नहीं रह जाती l
कहानी की शुरुवात होती है कश्मीर में एक ख़ुफ़िया मिशन से जिसका नेतृत्व कर रहे है कमांडर ‘’आदित्य शेरगिल ‘’ और उनकी एक मजबूत टीम l
इस ख़ुफ़िया मिशन में एक आसान सी लगती बाजी उलट जाती है जिसका परिणाम आदित्य की पूरी टीम को भुगतना पड़ता है , आदित्य इस खतरनाक मिशन में अपना एक हाथ गँवा देता है और एक दुस्वप्न भी अपने जीवन में शामिल कर लेता है l
हाथ गँवा देने के बाद रिटायरमेंट लेकर आदित्य अपने पुराने घर दिल्ली पहुँच चूका है ,आदित्य के जीवन में एक मात्र रिश्तेदार उसकी एन आर आई बहन त्रिशा उसका पति रोनाल्ड और उनकी बेटी यानी आदित्य की नकचढ़ी भांजी ‘सायना ‘’ जिसे इण्डिया आना पसंद ही नहीं l
त्रिशा और उसका परिवार विदेश में है लेकिन भाई के साथ हुए हादसे की वजह से वे कुछ दिन के लिए भारत आने का फैसला कर सके l
आदित्य ने अपनी जवानी घर परिवार से दूर सेना में ही बिताई है और अब वह अधेड़ हो चूका है l
त्रिशा और रोनाल्ड चाहते है के अब आदित्य को अपने अकेलेपन को ठहराव देना चाहिए और घर बसा लेना चाहिए l
आदित्य अपने परिवार से मिलकर खुश होता है लेकिन नकचढ़ी भांजी उसे बिलकुल भी पसंद नहीं करती है l लेकिन आदित्य अपने मित्रवत व्यवहार एवं समझदारी से सायना से एक बॉन्डिंग बना लेता है l
दिल्ली आते समय आदित्य की मुलाक़ात एक वेब जर्नलिस्ट ‘’रूही’’ से होती है ,जिसके प्रति वह आकर्षित होता है l
सत्रह साल आम दुनिया से दूर रहने के बाद अब काफी चीजे बदल चुकी है ,जिससे आदित्य अनजान है ,हैरान है l
वह इस बदली दुनिया और समाज से तालमेल बिठाने की भरसक कोशिश कर रहा है l
सब कुछ ठीक चल रहा होता है के अचानक एक दिन एक हादसा होता है जिससे आदित्य का परिवार तहस नहस हो जाता है ,और आदित्य अंदर से बुरी तरह टूट जाता है l
उसे सिस्टम की नाकामी और समाज में बढती असंवेदनशीलता से डिप्रेशन होने लगता है l
लेकिन वह खुद को सम्भालता है क्योकि अब सायना आदित्य की जिम्मेदारी बन चुकी है l
इंसानियत के विद्रूप स्वरूप से उसका परिचय होता है , अपने अंदर के क्रोध को वह दबाए हुए है और हर मुमकिन कोशिश वह कर चूका है इन्साफ पाने के लिए लेकिन कही से भी कोई मदद नहीं मिलती l
अपने इसी गुस्से के फलस्वरूप वह एक महिला की आबरू बचाता है जिसमे खुद बुरी तरह से घायल हो जाता है l उसका यह विडिओ वायरल हो जाता है और मायूस लोग इस कानून व्यवस्था और लचर यन्त्रणा से त्रस्त जनता उसमे अपना हीरो खोजने लगती है l
जाने अनजाने में आदित्य एक प्रेरणा का रूप ले लेता है , रही सही कसर शोशल मिडिया और इंटरनेट पूरी कर देते है l
आदित्य ऐसा कुछ नहीं चाहता था लेकिन सायना उसे सुपरहीरो के रूप जो उम्मीद की लौ जगी है उसे न बुझने देने का वचन लेती है l
फिर क्या होता है यह आप विस्तार से पुस्तक में ही पढ़े l
यदि आपको लगता है के पूरी कहानी का सारांश आपके सामने है तो यकीन मानिए ऐसा कुछ नहीं है l
कहानी की गहराई और बारीकी जितनी कॉमिक्स में है उतने का एक प्रतिशत भी इस रिव्यू में नहीं है l
कहानी बेहद दिलचस्प और बिना किसी जटिलता के कही गयी है ,और पूरा विस्तार दिया गया है , हर पृष्ठ में सात से लेकर आठ पैनल्स तक है जो कहानी को पर्याप्त विस्तार देते है और दिलचस्पी बनाए रखते है l
शुरुवाती बाईस पृष्ठ सिहरन दौड़ा देते है ,आदित्य का कश्मीर मिशन और आतंकवादियों से भिडंत के दृश्य बेहद जबरदस्त है और नैरेशन भी गति लिए हुए मानो आप किसी सजीव दृश्य को देख रहे है l
सेना के इस मिशन में विपरीत परिस्थितियां एवं आत्मघाती घटनाओ के बेहतरीन विवरण किया गया है ,किसी थोथे आडम्बर को प्राथमिकता देने के बजाय सही समय पर सही निर्णय लेने फैसला लेने में दिखाई देरी का भयंकर परिणाम बेहद रोमांचक एवं सत्य के समीप दिखाया गया है l
यह चैप्टर सभी पाठको को सबसे अधिक पसंद आएगा l
दूसरा हिस्सा  आदित्य का समाज से और अपने परिवार से सामंजस्य बिठाने का है , जिसे बेहद रोचक तरीके से नैरेट किया गया है ,खासकर अपनी भांजी सायना से उसके तालमेल को l
किस तरह एक नकचढ़ी और उसे पसंद न करनेवाली किशोर लडकी को उसी के रंग में ढलकर आदित्य अपना बना लेता है वह वाकी काफी प्यारा प्रसंग है l जिसमे आदित्य और सायना का कॉमिक्स प्रेम काफी सहायक होता है ,यहाँ दोनों के संबंधो में कॉमिक्स को आधार बनाया गया है जो बेहद ही बढ़िया प्रयोग है और पाठक जिससे खुद को रिलेट कर सकेंगे l
एक प्रसंग है जिसमे आदित्य टूट चुकी सायना के चेहरे पर दुबारा मुस्कान देखने के लिए तनाव के बावजूद ‘जस्टिस लीग ‘’ की कॉमिक्स खरद कर देता है l
लेकिन सायना अपने सारे कॉमिक्स जला देती है क्योकि उसका वास्तविकता से परिचय हो चूका है ,और वह इन काल्पनिक सुपरहीरोज से नफरत करने लगती है जो इतने शक्तिशाली होने के बावजूद उसके माँ बाप की मदद नहीं कर सके l
उसके इसी नफरत के कारण एक असल सुपरहीरो का उद्गम होता है और उसके विश्वास को कायम रखने के लिए आदित्य अनजाने में एक हीरो बनकर उभरता है l
कुल मिलाकर एक बढ़िया और अलग तरह की सुपरहीरो स्टोरी है जो वास्तविकता के कही नजदीक है , कॉमिक्स फैन्स और सुपरहीरो जेनर को पसंद करनेवालों को अवश्य यह कहानी पसंद आयेगी l


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